कुणाल बढ़ता गया… बिना बोले – एक बाल कथा
[vc_row][vc_column][vc_column_text css=""]गर्मी की छुट्टियों में कुणाल अपने दादाजी के गाँव आया। शहर की ऊँची इमारतों और मोबाइल स्क्रीन से दूर गाँव की खुली हवा और हरियाली उसे शुरू में अजीब लग रही थी, लेकिन कुछ ही दिनों में वह सुबह जल्दी उठने, आम के पेड़ों के नीचे भागने, और मिट्टी में खेलने का आदी हो गया।एक सुबह जब सूरज हल्के नारंगी रंग में आसमान से झाँक रहा था, कुणाल अपने दादाजी के साथ गाँव के बाहर खेतों की ओर टहलने निकला। खेत के एक कोने पर एक बहुत ऊँचा, सीधा, शांत खड़ा ताड़ का पेड़ था। उसका तना बिना किसी टेढ़ेपन के ऊपर आकाश की ओर बढ़ता चला गया था। नीचे कोई शाखा नहीं थी — मानो वह पेड़ नहीं, एक लंबी साँस हो।कुणाल की...